संसार के महासागरों के जल के तापक्रम (Temperature of oceanic water) को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिये

अथवा, महासागरीय जल में तापक्रम के क्षैतिज तथा लम्बवत् वितरण की व्याख्या कीजिए। अथवा, महासागरीय जल में तापमान के वितरण प्रारूप की विवेचना कीजिए।

Ans. महासागरों में तापक्रम का महत्त्व उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि स्थलीय भाग का। महासागरों के जल का तापमान इनमें रहने वाले जीव-जन्तुओं तथा वनस्पति परः अधिक प्रभाव डालता है। महासागरों के तटीय भाग तथा दूर के क्षेत्रों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। महासागर तथा सागर इस सम्पूर्ण पृथ्वी के 3/4 भाग पर फैले हुये हैं। इसलिये स्थलीय भागों का तापक्रम महासागरीय तल के तापमान पर निर्धारित होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि महासागरीय जल का तापमान महासागरों को नहीं बल्कि सम्पूर्ण धरातल के प्राणिजगत को प्रभावित करता है।

महासागरीय जल के तापक्रम का प्रमुख स्त्रोत सूर्य है, महासागरों से जल के तापक्रम को तापान्तर के आधार पर अच्छी तरह से समझा जा सकता है। तापान्तर के दो प्रकार होते हैं-

  1. दैनिक तापान्तर: एक दिन तथा रात के अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान के अन्तर को दैनिक तापान्तर कहते हैं। वायुमण्डलीय दशाओं का दैनिक तापान्तर पर काफी प्रभाव पड़ता है। महासागरों के दैनिक तापान्तर पर वायुमण्डलीय दशाओं का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है यदि आकाश साफ रहता है तो महासागरीय जल का तापमान अधिक हो जाता है और बादलों से युक्त आकाश से महासागरीय जल का तापमान कम हो जाता है। निम्न अक्षांशों की तुलना में उच्च अक्षांशों में दैनिक तापान्तर कम रहता है। महासागरीय सतह का दैनिक तापान्तर 1°C होता है।
  2. वार्षिक तापान्तर एक वर्ष के न्यूनतम तथा अधिकतम तापमान के अन्तर को वार्षिक पान्तर कहते हैं। महासागरीय जल का वार्षिक तापान्तर लगभग 10° फा रहता है। परन्तु -लग-अलग क्षेत्रों के तापमान में भिन्नता मिलती है। महासागरीय जल का अधिकतम तापमान अगस्त
  3. में तथा न्यूनतम फरवरी में मिलता है। सम्पूर्ण जल महासागरों, सागरों तथा छोटे-छोटे सागरों के रूप में फैला हुआ है। इस वितरण का प्रभाव जल के तापान्तर पर बहुत अधिक पड़ता है. क्योंकि यदि जल का विस्तार अधिक होगा तो तापान्तर कम होगा और यदि जल का विस्तार कम होगा तो तापान्तर अधिक होता है। इसके अतिरिक्त सूर्य ताप की प्राप्ति में भिन्नता प्रचलित हवायें, महासागर की स्थिति तथा स्वभाव आदि भौतिक दशाओं का भी तापान्तर पर काफी प्रभाव पड़ता है।
  4. महासागरीय तापक्रम के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक : महासागरीय जल के तापमान में ऋतु परिवर्तन के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। महासागरीय जल की ऊपरी एवं निचली सतह के तापमान में भी अत्यधिक अन्तर देखने को मिलता है। खुले एवं बन्द सागरों के जल के तापमान में भी भिन्नता मिलती है। इस तरह महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
  5. अक्षांश: महासागरीय जल के तापमान के वितरण पर अक्षांशों का विशेष प्रभाव पड़ता है। महासागरीय जल का तापमान भूमध्य रेखा पर अधिक रहता है, कारण है कि इन क्षेत्रों में सूर्य की किरणें लम्बवत् चमकती हैं। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की तरफ तापमान में क्रमशः कमी होती जाती है, जैसे-0°, 45° एवं 90° अक्षांशों पर तापमान क्रमशः 27° सेल्सियस, 16° सेल्सियस, एवं 20 सेल्सियस पाया जाता है।
  6. थल एवं जल का असमान वितरण पृथ्वी पर थल एवं जल का असमान वितरण भी महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करता है। उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल भाग अधिक एवं जल भाग कम है, जबकि दक्षिण गोलार्द्ध में जल भाग अधिक एवं स्थल भाग कम है। उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल एवं जल का अनुपात 60 एवं 40 का है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में यह अनुपात 9 एवं 91 का है। जल एवं थल के असमान वितरण के कारण दोनों गोलार्द्ध में ग्रीष्मकाल में तापमान अधिक एवं शीतकाल में कम पाया जाता है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में शीत एवं ग्रीष्म के तापमान में कम अन्तर पाया जाता है। कारण है कि जल की अधिकता के कारण ऋतु परिवर्तन का कम प्रभाव पड़ता है।
  7. समुद्री धारायें: महासागरीय जल के तापमान को समुद्री धारायें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। समुद्री धारायें गर्म एवं ठण्डी दोनों स्वभाव को होती हैं। जब गर्म धारायें ठण्डे जल क्षेत्रों में पहुँच जाती हैं, तो वहाँ के तापमान में वृद्धि कर देती हैं, इसके विपरीत यदि ठण्डी धारायें गर्म जल क्षेत्रों में पहुँचती हैं तो वहाँ के तापमान को कम कर देती हैं, जैसे-क्यूरोशिवो की गर्म जल धारा एशिया के पूर्वी भागों में चलकर जब अलास्का के पश्चिमी तट पर पहुँचती है तो वहाँ के तापमान को बढ़ा देती है और वहाँ की जलवायु उष्णादं हो जाती है। इसी तरह गल्फस्ट्रोम गर्म जल धारा उत्तरी अमेरिका के तट से प्रारम्भ होकर जब यूरोप के उत्तरी-पश्चिमी भागों में पहुँचती है तो वहाँ के तापमान को बढ़ा देती है। इसके विपरीत, लेब्रोडोर की ठण्ड धारा मध्य अटलांटिक महासागर तक आकर एवं क्यूराइल को ठण्डी धारा मध्य प्रशान्त महासागर तक आकर इन क्षेत्रों के तापमान को कम कर देती है।
  8. हवायें: विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावित हवायें भी महासागरीय जल के तापमान को प्रभावित करती हैं। प्रचलित हवायें जब स्थल भाग की तरफ से समुद्री भागों में प्रवाहित होकर आती हैं तो महाद्वीपों के पूर्वी तट पर गर्म जलराशि का जमाव कर देती हैं, फलः तापमान में वृद्धि हो जाती है। जैसे-एशिया के पूर्वी भाग पर गर्म जलराशि के एकत्रित होने के तरण वहाँ से तापमान में वृद्धि हो जाती है और जलवायु सम रहती है। इसके विपरीत प्रयायें जब महासागरों से स्थल भाग की तरफ चलती हैं तो अपने तीव्र प्रवाह के साथ साजत के ऊपरी जल को लहरों के रूप में अपने साथ बहा ले जाती हैं, उस स्थान को पूर्ति हेतु निचली सतह से ठण्डा जल ऊपर आ जाता है। फलतः महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर तापमान आ जाती है, इसी प्रक्रिया के कारण दक्षिणी अमेरिका का पश्चिमी तट ठण्डा रहन ।

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